भक्तिपूर्ण माहौल में मनाई गई बलिदानी राजा गुरु बालकदास जी जयंती

भक्तिपूर्ण माहौल में मनाई गई बलिदानी राजा गुरु बालकदास जी जयंती
“शिक्षित बनें, संगठित रहें” के संदेश के साथ तीन महापुरुषों के आदर्शों पर चलने का आह्वान

बिलासपुर। माता सहोदरा जन कल्याण समिति, सतनाम बाड़ा, विद्याडीह के तत्वावधान में बलिदानी राजा गुरु बालकदास जी का भव्य जयंती समारोह रविवार, 16 अगस्त 2026 को प्रातः 10:30 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक सतनाम बाड़ा में अत्यंत भक्तिपूर्ण और प्रेरणादायक वातावरण में संपन्न हुआ। मूल जयंती तिथि 18 अगस्त है। समाजजनों की सुविधा हेतु समारोह दो दिन पूर्व आयोजित किया गया।कार्यक्रम की झलकियांबाड़ा की संचालिका शिक्षिका कुसुमलता जांगड़े एवं समिति की महिलाओं ने पारंपरिक रीति से पूजा-आरती संपन्न की। समिति की महिलाएं, कवि, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षकगण, प्रबुद्ध नागरिक और विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन धीमंत विजय कुमार हिरवानी ने कुशलतापूर्वक किया। अंत में सतनाम बाड़ा के संचालन गुरुजी बसंत जांगड़े ने आभार व्यक्त कर समाज को शिक्षित, संगठित और स्वाभिमानी बनने का आह्वान किया। समापन पर खीर का प्रसाद वितरण किया गया। वक्ताओं के उद्बोधनधीमंत हरीश पांडल, डॉ. दुर्गा प्रसाद मेरसा, धीमंत टेकचंद पांडल, यामिनी गांगिले और शिक्षक मन्नू कुर्रे ने गुरु बालकदास जी के जीवन, संघर्ष और बलिदान पर प्रकाश डाला। बताया गया कि सत्य के मार्ग पर चलकर गुरु जी राजा बने, सम्मान व अधिकार की रक्षा में बलिदान दिया और अंग्रेजों ने भी उन्हें राजा की उपाधि दी। यामिनी गांगिले ने महिलाओं की समान भूमिका पर जोर दिया, जबकि शिक्षक मन्नू कुर्रे ने शिक्षा को सबसे बड़ा हथियार बताया।तीन महापुरुषों का योगदान1. गुरु घासीदास जी (1756–1850): जाति-पाँति, छुआछूत और अंधविश्वास के विरुद्ध “सतनाम” का संदेश दिया। कहा _“सतनाम का जाप करो, जाति-पाँति छोड़ो, मनुष्य को मनुष्य समझो।”_2. गुरु बालकदास जी इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सामाजिक अन्याय और ब्रिटिश दबाव के विरुद्ध संघर्ष किया। वे “बलिदानी राजा” कहलाए। संदेश “सम्मान और अधिकार की रक्षा में बलिदान ही सबसे बड़ी पूजा है।”3.डॉ. बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर शिक्षा, संगठन और संविधान के माध्यम से क्रांति की। नारा “Educate, Agitate, Organize” आज भी प्रासंगिक है। कहा “शिक्षा ही वह हथियार है जिससे हम गुलामी की जंजीरें तोड़ सकते हैं।” तीनों महापुरुषों का मूल संदे एक है सत्य, समानता, शिक्षा, संगठन और स्वाभिमान। आज समाज को इन्हीं आदर्शों की सबसे अधिक आवश्यकता है।कार्यक्रम को सफल बनाने में चंद्रिका घृतलहरे, बिहारी कोशले, चौवन गेंदल, दिलहरन गांगिले, मंहगू अंचल के बुधेलाल, भोंदू, झलसे, सुखदास पंडित, कनेरी, डॉ. जीवन लाल, सुंदर लाल एवं महिलाओं में रामकली, श्यामकली, रागिनी तथा कुटेला के महिला समूहों का सहयोग रहा।