
फागुन के रंग, जायसी के संग
फागुन आया हँसता-गाता, रंगों की बरसात लिए,
धरती ने ओढ़ी पीत चुनरिया, खुशियों की सौगात लिए।
अबीर उड़ा जब नभ में जाकर, सपनों सा फैल गया,
हर सूना मन आज अचानक मधुबन सा महक गया।
जायसी कहे — रंग वही जो मन का मैल मिटाए,
प्यार की पिचकारी से हर दूरी पास बुलाए।
ढोलक की थाप पे थिरके आशा की हर डोरी,
मृदंग बजे तो झूम उठे जीवन की हर होरी।
गुलाल सजा जब गालों पर, हँसी हुई मनभावन,
रिश्तों की सूखी डाली पर फूटा फिर से सावन।
जायसी बोले — बैर जला दो होलिका की ज्वाला में,
प्रेम खिले हर दिल के आँगन, जैसे फूल उजाला में।
ना ऊँच-नीच का भेद रहे, ना मन में कोई दीवार,
आज सभी का एक रंग है — मानवता का प्यार।
रूठे मन को साथ बिठाकर हँसते-हँसते मनाओ,
मन की धूल झाड़ कर अपनी खुशियों को अपनाओ।
जायसी का संदेश यही — मुस्कान सबसे न्यारी,
सूखे अधरों पर सजा दो स्नेह की फुलवारी।
बूढ़े बन जाएँ बाल सखा, बच्चे गाएँ फाग,
रंगों में भीगें सपनों के सतरंगे अनुराग।
सास-सखी सब संग झूमें, देवर दे रंग हँसकर,
जीवन लगे मधुमास सुनहरा, जैसे जल में सागर।
जायसी कहता — होली केवल रंगों का त्योहार नहीं,
ये मन के मिलन का उत्सव है, इसमें कोई हार नहीं।
अहंकार की राख उड़ाओ, द्वेष-दहन कर डालो,
सत्य-सुगंध से भीगा मन हो, ऐसा रंग उछालो।
हर आँगन में दीप जले विश्वास और अपनापन का,
हर दिल में मधुरिम गान बजे प्रेम भरे जीवन का।
फागुन बोले — हँसो, हँसाओ, जीवन क्षणभंगुर है,
रंगों से जो जुड़ जाए, वही संबंध अमर है।
जायसी के संग गूँजे आज स्नेह का मधुर विहान,
रंगों में लिख दो प्रेम-गाथा, यही होली की पहचान।
डॉ. रविन्द्र जायसी